Poppy Playtime से Ice Scream तक; क्या हॉरर Games बिगाड़ रहे हैं बच्चों की मेंटल हेल्थ?
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से सामने आई एक बेहद दुखद घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। तीन नाबालिग बहनों द्वारा कथित रूप से आत्महत्या किए जाने के बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि क्या मोबाइल गेम्स, खासकर हॉरर और डरावने कंटेंट वाले गेम्स बच्चों की मानसिक स्थिति पर गंभीर असर डाल रहे हैं?
हालांकि पुलिस ने अभी तक यह साफ नहीं कहा है कि आत्महत्या का सीधा कारण कोई ऑनलाइन गेम था, लेकिन जांच के दौरान बच्चियों की डायरी और नोट्स में कुछ हॉरर गेम्स का बार-बार जिक्र मिला है। इसी वजह से यह मामला अब देशभर में पैरेंट्स, शिक्षकों और अधिकारियों के लिए एक चेतावनी बन गया है।

कैसे हुई घटना?
जानकारी के मुताबिक, तीनों बहनें लंबे समय से मोबाइल फोन पर काफी समय बिता रही थीं। पुलिस का कहना है कि फिलहाल किसी भी गेम को सीधे दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन बच्चों का लगातार स्क्रीन पर हॉरर कंटेंट देखना और गेम्स में अत्यधिक भावनात्मक रूप से जुड़ जाना चिंता का विषय जरूर है।
एक्सपर्ट मानते हैं कि किशोरावस्था में बच्चे मानसिक रूप से काफी संवेदनशील होते हैं और डर, तनाव या अकेलेपन की स्थिति में ऐसे कंटेंट का असर ज्यादा गहरा हो सकता है।
किन हॉरर गेम्स का नाम सामने आया?
जांच में कुछ लोकप्रिय मोबाइल हॉरर गेम्स का जिक्र बार-बार सामने आया है, जो भारत में आसानी से डाउनलोड किए जा सकते हैं:
1. Poppy Playtime
यह गेम एक डरावनी टॉय फैक्ट्री पर आधारित है, जहां अचानक जंप-स्केयर और खौफनाक किरदार बच्चों में डर और बेचैनी बढ़ा सकते हैं।
2. The Baby in Yellow
नाम सुनने में मासूम लगता है, लेकिन इसमें पैरानॉर्मल घटनाएं और डरावना माहौल बच्चों के दिमाग पर असर डाल सकता है।
3. Evil Nun: Scary Horror Games
इस गेम में एक स्कूल के अंदर डरावनी नन से बचकर भागना होता है। इसका कॉन्सेप्ट काफी तनावपूर्ण है।
4. Ice Scream
इसमें एक आइसक्रीम बेचने वाला विलेन बच्चों का अपहरण करता है। ऐसे विषय बच्चों में डर और चिंता को बढ़ा सकते हैं।
बच्चों पर हॉरर गेम्स का क्या असर
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार हॉरर कंटेंट खेलने से बच्चों में कई बदलाव देखने को मिल रहा है।
- चिंता और डर बढ़ सकता है
- नींद की समस्या हो सकती है
- अकेलापन और सोशल विड्रॉल बढ़ सकता है
- व्यवहार में बदलाव आ सकता है
- अत्यधिक स्क्रीन टाइम से मानसिक थकान हो सकती है
- खासकर 12-16 साल के बच्चों में यह प्रभाव ज्यादा देखने को मिलता है।
पैरेंट्स क्या कर सकते हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि मोबाइल गेम्स को पूरी तरह रोकना समाधान नहीं है, बल्कि सही निगरानी जरूरी है:
- Parental Control ऑन करें
- बच्चों के गेम्स की Age Rating जरूर देखें
- रोजाना स्क्रीन टाइम लिमिट तय करें
- बच्चों से खुलकर बात करें कि वे क्या खेल रहे हैं
- अगर बच्चा चुप, परेशान या अलग व्यवहार करने लगे तो तुरंत ध्यान दें
- जरूरत पड़े तो प्रोफेशनल काउंसलिंग लेने में देर न करें
गाजियाबाद की घटना एक गंभीर चेतावनी है कि डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा केवल तकनीकी नहीं, मानसिक स्तर पर भी जरूरी है। हॉरर गेम्स या ऑनलाइन कंटेंट का प्रभाव हर बच्चे पर अलग हो सकता है, लेकिन सतर्क पैरेंटिंग और समय रहते बातचीत कई बड़े खतरे टाल सकती है।


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