रात के 2:30 बजे जन्मा Google का ‘Nano Banana AI', गलती से रखा गया ये नाम
Googles Nano Banana: गूगल का नया इमेज जेनरेशन मॉडल Gemini Nano Banana AI अपने कमाल के परफॉर्मेंस साथ अपने अजीबो-गरीब नाम की वजह से भी सुर्खियों में है। अब इस नाम के पीछे की कहानी सामने आई है।
Made by Google पॉडकास्ट में गूगल के ग्रुप प्रोडक्ट मैनेजर डेविड शैरन ने बताया कि यह नाम असल में एक अस्थायी प्लेसहोल्डर था, जिसे बाद में कंपनी ने स्थायी रूप से अपना लिया।

Nano Banana कैसे बना पहचान
डेविड शैरन के अनुसार, कंपनी की एक कर्मचारी नीना ने इस मॉडल को LM Arena नामक पब्लिक प्लेटफॉर्म पर गुमनाम रूप से सबमिट किया था। वहां मॉडल को सबमिट करने के लिए एक अस्थायी नाम देना जरूरी था। नीना ने बिना ज्यादा सोचे 'Nano Banana' नाम दर्ज कर दिया।
यह नाम रात करीब 2:30 बजे नीना ने डाला था, शैरन ने कहा। जब मॉडल प्लेटफॉर्म पर आया, तो लोग इसे 'Nano Banana' कहने लगे और यह नाम पॉपुलर हो गया। इसलिए हमने इसे स्थायी नाम के रूप में रख लिया।
मॉडल की खासियत
नाम के अलावा, Gemini Nano Banana अपनी इमेज जेनरेशन क्वालिटी के कारण भी चर्चा में है। यह मॉडल सब्जेक्ट की पहचान को सटीक बनाए रखते हुए रचनात्मक और जटिल विजुअल्स तैयार करता है। शैरन ने बताया कि जब मैंने पहली बार Nano Banana टेस्ट किया, तो मैंने अपनी तस्वीर को स्पेस में डालने को कहा और पहली बार मुझे अपनी असली पहचान वाली इमेज मिली।
यह मॉडल इस तरह के परिणाम देने वाला पहला AI टूल साबित हुआ है, जो चेहरों, पालतू जानवरों और वस्तुओं की पहचान को बनाए रखते हुए कल्पनाशील बैकग्राउंड तैयार करता है।
गूगल की 'Greenfield' टीम का योगदान
गूगल की Greenfield टीम ने इस मॉडल को कई रचनात्मक प्रयोगों के माध्यम से परखा। एक उदाहरण में जब मॉडल से 'काउच' और 'पोटैटो' को मिलाकर इमेज बनाने को कहा गया, तो इसने सफलतापूर्वक 'काउच पोटैटो' की वास्तविक छवि तैयार की।
इन रिजल्ट्स ने साबित किया कि Nano Banana AI पारंपरिक इमेज जेनरेशन से आगे बढ़कर भावनात्मक और कल्पनाशील अवधारणाओं को भी प्रभावी ढंग से संभाल सकता है। यह गूगल के AI मॉडल्स के क्रिएटिव विकास की दिशा में एक जरूरी कदम है।


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