E-Waste से निकलेगा सोना; सरकार का ₹1500 करोड़ ‘क्रिटिकल मिनरल रीसाइक्लिंग मिशन’ भारत को बनाएगा मेटल आत्मनिर्भर
भारत अब अपने कचरे से खजाना निकालने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ा चुका है। सरकार ने हाल ही में ₹1,500 करोड़ की 'क्रिटिकल मिनरल रीसाइक्लिंग स्कीम' को मंजूरी दी है, जो न केवल देश में ई-वेस्ट प्रबंधन को मजबूत करेगी बल्कि लिथियम, निकल, कोबाल्ट और अन्य कीमती धातुओं की घरेलू सप्लाई चेन को भी आत्मनिर्भर बनाएगी।
यह कदम भारत के नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन का हिस्सा है, एक ऐसा प्रोजेक्ट जो आने वाले समय में इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, और EV इंडस्ट्री की नींव को मजबूत करेगा।

ई-वेस्ट नहीं अब 'ई-गोल्ड
भारत हर साल करीब 50 लाख टन ई-वेस्ट पैदा करता है, लेकिन अभी तक उसका सिर्फ एक छोटा हिस्सा ही वैज्ञानिक रूप से रीसाइक्लिंग होता है। इसमें मौजूद कॉपर, लिथियम, निकल, और कोबाल्ट जैसे मिनरल्स देश के EV और बैटरी सेक्टर के लिए बेहद अहम हैं।
सरकार की नई योजना इस वेस्ट को एक 'रीसोर्स' में बदलने की कोशिश है। इस स्कीम के तहत प्राइवेट सेक्टर को प्रोत्साहन मिलेगा ताकि वे उन्नत हाइड्रोमेटलर्जी और एंड-टू-एंड रीसाइक्लिंग टेक्नोलॉजी का उपयोग कर इन धातुओं को दोबारा इस्तेमाल के योग्य बना सकें।
2 अक्टूबर से शुरू हुई प्रक्रिया
खास बात यह है कि इस स्कीम का एप्लिकेशन पोर्टल 2 अक्टूबर 2025 से ही शुरू कर दिया गया है, यानी योजना के मंज़ूरी मिलते ही सरकार ने इसे अमल में लाने की दिशा में तेज़ी दिखाई।
खनन मंत्रालय (Ministry of Mines) ने स्टेकहोल्डर्स से परामर्श के बाद दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अब उद्योग जगत इस अवसर को लेकर उत्साहित है क्योंकि इससे रीसाइक्लिंग सेक्टर में नया निवेश और रोजगार दोनों आएंगे।
IITs और CSIR बने 'रीसाइक्लिंग रिसर्च हब'
भारत के शीर्ष तकनीकी संस्थान IITs, CSIR लैब्स और अन्य R&D सेंटर्स पहले से ही धातु निष्कर्षण (metal extraction) और शुद्धिकरण की घरेलू तकनीक विकसित कर चुके हैं।
इन संस्थानों ने लिथियम-आयन बैटरी (LIBs) और कैटेलिटिक कन्वर्टर जैसे स्क्रैप से मेटल्स निकालने की विधियां तैयार की हैं। अब ये संस्थान रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री को तकनीकी सहायता और ट्रेनिंग भी देंगे।
मंत्रालय ने संकेत दिए हैं कि स्कीम के लाभार्थियों की स्किल ट्रेनिंग भी इन्हीं संस्थानों के सहयोग से पूरी की जाएगी - यानी इंडस्ट्री और शिक्षा जगत का मिलन, जो भारत को ग्रीन और क्लीन इंडस्ट्रियल हब बनाने की दिशा में अहम है।
सप्लाई चेन बनेगी सस्टेनेबल
भारत अभी तक खासकर ऑस्ट्रेलिया, चीन और अफ्रीका से अपनी बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री के लिए बड़ी मात्रा में लिथियम और कोबाल्ट आयात करता है।
इस नई स्कीम के जरिए सरकार का लक्ष्य है कि देश में ही रीसाइक्लिंग-आधारित सप्लाई चेन तैयार हो ताकि आयात पर निर्भरता घटे और सस्टेनेबल माइनिंग मॉडल विकसित हो सके।
लंबे समय में यह कदम न केवल पर्यावरण को लाभ पहुंचाएगा, बल्कि भारत को वैश्विक "ग्रीन मेटल हब" के रूप में स्थापित कर सकता है।
भारत का नया इंडस्ट्रियल मंत्रा
यह योजना केवल रीसाइक्लिंग तक सीमित नहीं है। इसका असली उद्देश्य है कचरे से आत्मनिर्भरता (Waste to Wealth) का नया औद्योगिक मॉडल बनाना।
आज जब इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर सोलर एनर्जी तक हर सेक्टर को क्रिटिकल मिनरल्स की ज़रूरत है, ऐसे में यह स्कीम भारत को सप्लाई चेन के 'निचले पायदान' से उठाकर 'वैश्विक खिलाड़ी' बनाने की क्षमता रखती है।
अगर निजी क्षेत्र, अनुसंधान संस्थान और सरकार मिलकर इस दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो आने वाले दशक में ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग भारत की नई 'ग्रीन इकॉनमी' की रीढ़ बन सकती है।
भारत अब केवल इलेक्ट्रॉनिक्स का उपभोक्ता नहीं, बल्कि 'रिसोर्स क्रिएटर' बनने की राह पर है। ₹1500 करोड़ की यह स्कीम यह साबित करती है कि भविष्य का सोना अब धरती के नीचे नहीं, बल्कि हमारे कचरे के ढेरों में छिपा है, बस सही नीति और तकनीक से उसे बाहर लाना बाकी है।


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