क्या बिना इजाजत हमारी खबरें चुरा रहे हैं AI; Google और बॉट्स पर लगाम कसने की तैयारी
जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तेजी से हमारे डिजिटल जीवन का हिस्सा बन रहा है, वैसे-वैसे इसके असर का दायरा भी बढ़ रहा है। खासकर मीडिया और जर्नलिज्म के क्षेत्र में इसका प्रभाव देखने को मिल रहा है। हाल ही में Cloudflare के CEO मैथ्यू प्रिंस ने एक कड़ा बयान देते हुए चेतावनी दी कि गूगल और AI कंपनियां जिस तरह से वेब से कंटेंट स्क्रैप कर रही हैं, वह 'ओपन वेब की नींव को नष्ट कर सकती हैं'।
ग्लोबल लेवल पर इस चेतावनी को गंभीरता से लिया गया है। अमेरिका और यूके जैसे देशों में बड़े न्यूज पब्लिशर्स, जैसे Time, Sky News, The Atlantic, Buzzfeed आदि ने मिलकर AI बॉट्स को अपनी वेबसाइट्स से कंटेंट एक्सेस करने से ब्लॉक कर दिया है। इस मुहिम में Cloudflare का टेक्नोलॉजिकल सपोर्ट एक बड़ी ताकत बनकर उभरा है।

कैसे होती है न्यूज चोरी?
आजकल Google और AI बॉट्स (जैसे OpenAI का GPTBot, Meta का External Agent, और Anthropic का ClaudeBot) न्यूज वेबसाइट्स से आर्टिकल्स, फोटोज, और डेटा बिना इजाजत के कॉपी कर रहे हैं। ये AI टूल्स तुम्हारे सर्च का जवाब सीधे Google पर या चैटबॉट में दे देते हैं, जिससे लोग न्यूज वेबसाइट्स पर क्लिक ही नहीं करते।
Matthew Prince ने बताया कि 6 महीने पहले 75% Google सर्च बिना क्लिक के खत्म हो रहे थे, और अब ये आंकड़ा 90% तक पहुंच गया है। यानी, न्यूज वालों की मेहनत का फायदा AI फ्री में ले रहा है और उनके वेबसाइट्स की अर्निंग घट रही है। भारत में डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स, जैसे कि डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA), इसे 'डेटा चोरी' बता रहे हैं।
भारत में क्या दिक्कत है?
भारत में न्यूज वेबसाइट्स की हालत और खराब है। यहां के जर्नलिस्ट और एडिटर्स दिन-रात मेहनत करके खबरें बनाते हैं, लेकिन AI कंपनियां बिना इजाजत या पैसे दिए उनका कंटेंट इस्तेमाल कर रही हैं। DNPA के एक प्रवक्ता ने कहा कि भारत में हालात बद से बदतर हो रहे हैं।
विदेशों में तो पब्लिशर्स ने AI बॉट्स को ब्लॉक करना शुरू कर दिया, लेकिन यहां न कोई नियम है, न कोई लाइसेंसिंग सिस्टम। DNPA ने सरकार से मांग की है कि वो AI स्क्रैपिंग को कॉपीराइट उल्लंघन माने और इसके खिलाफ तुरंत कदम उठाए।
ग्लोबल लेवल पर Publishers का क्या है रिएक्शन
Cloudflare की रिपोर्ट में पता चला है कि गूगल पर अब 90% सर्चेज बिना किसी क्लिक के खत्म हो जाती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि गूगल अब खुद अपने AI टूल्स से सवालों के जवाब दे देता है, जिससे यूजर्स वेबसाइट पर जाकर पूरा आर्टिकल पढ़ने की जरूरत नहीं समझते। इससे नतीजा ये होता है कि पब्लिशर्स को न रीडरशिप मिलती है और न ही रेवेन्यू मिलता है।
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिका और यूरोप के पब्लिशर्स ने AI क्रॉलर को ब्लॉक करना शुरू कर दिया है और 'Pay-per-Crawl' जैसे मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं, जहां AI कंपनियों को कंटेंट एक्सेस के लिए पैसे देने होंगे। इसके साथ ही वेबसाइट्स को यह चुनने का अधिकार मिल गया है कि वे किन बॉट्स को किस हद तक एक्सेस देंगी।
भारत की क्या है स्थिति
दूसरी ओर भारत में हालात अभी तक काफी कमजोर नजर आ रहे हैं। DNPA (Digital News Publishers Association) जैसी संस्थाएं लगातार यह दावा कर रही हैं कि भारतीय न्यूज पब्लिशर्स का कंटेंट भी AI मॉडल्स द्वारा बगैर इजाजत के स्क्रैप किया जा रहा है, लेकिन अभी तक न तो कोई कड़ा कानून आया है और न ही टेक्नोलॉजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध हुआ है जिससे भारतीय पब्लिशर्स अपनी सामग्री की सुरक्षा कर सकें।
भारत में कई डिजिटल पब्लिकेशन AI कंपनियों द्वारा "अनधिकृत डेटा चोरी" के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। उनका कहना है कि गूगल या ChatGPT जैसे प्लेटफॉर्म उनके आर्टिकल्स से जानकारी लेकर उसे बिना किसी क्रेडिट या भुगतान के AI आउटपुट के रूप में प्रस्तुत करते हैं ।
DNPA की मांग
DNPA और अन्य भारतीय डिजिटल मीडिया संस्थानों ने MeitY और सूचना और प्रसारण मंत्रालय से कुछ मांग की है।
- AI द्वारा बिना अनुमति कंटेंट इस्तेमाल को कॉपीराइट उल्लंघन माना जाए।
- AI मॉडल्स को ट्रेन्ड करने से पहले कंटेंट क्रिएटर्स की सहमति जरूरी हो।
- एक भारतीय लाइसेंसिंग फ्रेमवर्क बनाया जाए, जैसा अमेरिका और यूके में लागू हो रहा है।
- छोटे पब्लिशर्स को Cloudflare जैसे टूल्स का सहयोग मिले ताकि वे भी अपने डेटा की सुरक्षा कर सकें।
भारत के लिए सबक
अगर भारत को AI और डिजिटल कंटेंट में ग्लोबल लीडर बनना है, तो उसे अपने कंटेंट क्रिएटर्स की रक्षा करनी होगी। AI इनोवेशन जरूरी है, लेकिन बिना पत्रकारों और लेखकों के अधिकारों की रक्षा किए यह इनोवेशन सिर्फ कॉर्पोरेट्स के फायदे का माध्यम बन जाएगा।
AI और मीडिया के इस टकराव में दुनिया जाग रही है, लेकिन क्या भारत भी समय रहते चेत पाएगा? क्योंकि अगर अपने कंटेंट की रक्षा नहीं की गई, तो आने वाले समय में भारतीय डिजिटल मीडिया की पहचान और अस्तित्व दोनों खतरे में पड़ सकते हैं।


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