नासा के गुब्‍बारे मंगल ग्रह पर रखेंगे नजर

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अंतरिक्ष में ग्रहों पर नजर रखने वाले वैज्ञानिकों ने एक नया उपकरण विकसित किया है, जो सौर मंडल में ग्रहों की निगरानी करेगा। वर्जीनिया स्थित नासा की वेलॉप फ्लाइट फैसिलिटी ने एक नई प्रणाली विकसित की है, जिसका नाम वेलॉप आर्क सेकेंड पॉइंटर (डब्ल्यूएएसपी)है। यह प्रणाली उप-आर्क सेंकेंट पर सटीक और स्थिर रूप से गुब्बारानुमा वज्ञानिक उपकरणों की निगरानी करेगी।

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ऑब्जर्वेटरी फॉर प्लैनेटरी इनवेस्टिगेशन फ्रॉम द स्ट्रेटोस्फेयर (ओपीआईएस) के वैज्ञानिक टेरी हर्फर्ड ने कहा, "पृथ्वी के वातावरण से 95 प्रतिशत ऊंचाई वाले गुब्बारे पराबैंगनी और अवरक्त तरंगदैर्ध्य बैंड की निगरानी और निरीक्षण के लिए भी सक्षम होते हैं, जो धरती पर स्थित दूरबीन के माध्यम से संभव नहीं है।

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डब्ल्यूएएसपी के परियोजना प्रबंधक डेविड स्टकलिक ने कहा, "आर्क सेंकेंड पॉइंटिंग अविश्वसनीय रूप से सटीक है। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि यह उपकरण दो मील के वृत्ताकार क्षेत्र में भी किसी वस्तु का पता लगाकर उसकी स्थिति बता सकता है। डब्ल्यूएएसपी को इतना अधिक लचीला और मानकीकृत प्रणाली बनाया गया है, कि यह कई विज्ञान पेलोड का भार संभाल सके।

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नासा के साइंटफिक बैलून रिसर्च प्रोग्राम के लिए प्रयोग किए जाते हैं, इन बैलूंन की मोटाई (0.8 mil) पॉलीथिन के जितनी होती है। लेकिन ये 4000 किलो तक का भार 460 फीट ऊपर तक ले जा सकते हैं।

बैलून में हीलियम गैस का प्रयोग किया जाता है, जो ऊंचाई बढ़न के साथ बैलून में फैलती जाती है। ये प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक हीलियम पूरी तरह से अपना आकार न ले लें। बैलून में लगे दूसरे यंत्र डेटा रिकार्ड करते रहते हैं। जब बैलून अपनी पूरी दूरी तय कर लेता है तो नीचे से र‍ेडियो सिग्‍नल द्वारा बैलून की गैस निकाल दी जाती है और पैराशूट की मदद से यंत्र सुरक्षित धरती पर आ जाता है।

नासा एक साल में करीब 20 बैलून रिसर्च के लिए भेजता है जिसमें 92 प्रतिशत सक्‍सेस रहते हैं।

सबसे पहला फायदा बैलून रॉकेट और यान की तुलना में सस्‍ते पड़ते हैं साथ ही इन्‍हें कम समय में तैयार किया जा सकता है और कहीं से भी भेजा जा सकता है।

बैलून रिसर्च युवा साइंटिस्‍कों के लिए एक वरदान की तरह है, वे इसकी मदद से कई रिसर्च करते हैं साथ ही आसानी डेटा भी ले सकते हैं। बैलून रिसर्च के लिए न तो ज्‍यादा लागत लगती है और न ही कोई खास यंत्र की जरूरत पड़ती है।


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