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#NostarlinkSurrender क्यों हो रहा है ट्रेंड? केवल कॉन्सपिरेसी थ्योरी या कोई सच्चाई; सरकार की क्या तैयारी..

No Starlink Surrender in Trend: सोशल मीडिया आम जनता के लिए ऐसा प्लेटफॉर्म है, जिस पर वे सरकार की किसी पहल या किसी भी समस्या पर विरोध या सपोर्ट दिखाते हैं। कभी-कभी इसका असर इतना ज्यादा होता है कि कई बड़े फैसलों में बदलाव भी किया गया है। इसी सिलसिले में एक और हैशटैग काफी ट्रेंड हो रहा है, जिसने स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस के भारत में लॉन्च होने पर भी सवाल खड़ा कर दिया है।

बीते कुछ दिनों में स्टारलिंक भारत में एक ऐसा विषय बन गया है, जिसने आम जनता के साथ-साथ सरकार को भी प्रभावित किया है। आपको बता दें कि एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस को लॉन्च करने की तैयारी कर ली है। जल्द ही इसे लॉन्च किया जाएगा, लेकिन इससे पहले ही X (पूर्व में ट्विटर) ने एक बड़ी जंग छेड़ दी है। X पर 5900 से ज्यादा पोस्ट हैं, जिसमें #NostarlinkSurrender ट्रेंड हो रहा है। आइए जानते हैं कि इस हैशटैग में क्या सच्चाई है और कितनी कॉन्सपिरेसी थ्योरी?

क्यों ट्रेंड हो रहा #NostarlinkSurrender?

#NostarlinkSurrender क्यों हो रहा ट्रेंड?

बीते कुछ दिनों से चर्चा में रहने के बाद Starlink अब ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा है, लेकिन इसमें कोई पॉजिटिव सपोर्ट नहीं है। भारतीय स्टारलिंक का विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि अगर स्टारलिंक भारत में आता है तो यह नेशनल सिक्योरिटी के लिए खतरा हो सकता है। ऐसे में हजारों ऐसे पोस्ट X पर सामने आए हैं, जो कई कारणों के बारे में बता रहे हैं।

कुछ लोग इस बात को लेकर चिंता में हैं कि अगर देश के बाहर की तकनीकी का इस्तेमाल किया जाएगा तो क्या इससे देश की डिजिटल सिक्योरिटी बनी रहेगी। इसको लेकर कई पोस्ट सोशल मीडिया पर सामने आए हैं।

नेशनल सिक्योरिटी का है मसला

एक पोस्ट में यूजर्स ने लिखा है कि अगर Starlink युद्ध के बीच में शटडाउन हो जाता है तो इमेजिंग करें कि क्राइसिस के समय भारत की क्या स्थिति होगी। नेशनल सिक्योरिटी किसी एक व्यक्ति की मर्जी पर नहीं टिकी रह सकती है।

वहीं एक दूसरे यूजर ने अपने पोस्ट में लिखा कि सैटेलाइट के जरिए डिलीवर किया जाने वाला हर मेगाबाइट भारतीय कानून, भारतीय नागरिकों और भारतीय संस्थानों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए - किसी अनिर्वाचित अरबपति के प्रति नहीं। इन पोस्ट के जरिए स्टारलिंक के साथ-साथ एलन मस्क पर भी सवाल उठाया गया है।

इसके अलावा कई पोस्ट में लोगों ने भारतीय सैनिकों को लेकर भी अपनी चिंता व्यक्त की है। एक पोस्ट में कहा गया है कि भारतीय सैनिकों के संघर्ष क्षेत्रों में कनेक्शन के लिए विदेशी सीईओ पर क्यों निर्भर रहना चाहिए? राष्ट्रीय सुरक्षा कभी भी एक व्यक्ति की स्वीकृति पर निर्भर नहीं होनी चाहिए।

Make in India पर जोर

वहीं कुछ पोस्ट में विदेशी टेक्नोलॉजी को इस्तेमाल करने के बजाय स्वदेशी टेक्नोलॉजी को लाने पर जोर दिया गया है। ऐसे में कई ऐसे पोस्ट हैं, जो इसका विरोध करते नजर आते हैं।

एक पोस्ट में यूजर ने लिखा भारत अपने आसमान या अपने डिजिटल भविष्य को विदेशी दिग्गजों के हवाले नहीं करता। स्टारलिंक तकनीक ला सकता है, लेकिन स्वतंत्रता, सुरक्षा और स्थानीय नवाचार अधिक मायने रखते हैं। हम निर्माण करते हैं, हम नवाचार करते हैं, हम अपने भविष्य के मालिक हैं - कोई समझौता नहीं।

इसके साथ ही बहुत से पोस्ट में यह भी कहा गया कि अगर स्टारलिंक आता है तो भारत यूक्रेन से भी ज्यादा असुरक्षित हो जाएगा।

सच्चाई या कॉन्सपिरेसी थ्योरी?

हालांकि अभी तक इस बात की कोई पुष्टि नहीं हुई है कि क्या सच में स्टारलिंक नेशनल सिक्योरिटी के लिए समस्या बन सकता है या नहीं, लेकिन भारत सरकार और टेलीकॉम डिपार्टमेंट पहले से ही इसको लेकर पूरी तरह से तैयार है।
जहां एक तरफ स्टारलिंक और अन्य विदेशी कंपनियों के लिए सख्त नियम तैयार किए गए हैं, वहीं दूसरी तरफ एक ऐसी मॉनिटरिंग फैसिलिटी बनाई जा रही है, जो इन सैटेलाइट्स और पड़ोसी देशों की प्रतिक्रिया पर नजर रखेगी।

सरकार ने सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सर्विस के ऑपरेट को लेकर नियमों को पहले से कहीं अधिक सख्त कर दिया है। अब सैटेलाइट सर्विस प्रोवाइडर्स को 30 से अधिक अनुपालन मानकों को पूरा करना होगा। इन नियमों से सरकार सुनिश्चित करना चाहती है कि देश की डिजिटल लिमिट पूरी तरह सिक्योर रहे।

वहीं अगर खास मॉनिटरिंग फैसिलिटी (Monitoring Facility) की बात करें तो इसे तैयार करने के लिए लगभग 930 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा।

यह मॉनिटरिंग सेंटर भारतीय सीमा के आसपास एक्टिव घरेलू और विदेशी सैटेलाइट की मॉनिटरिंग करेगा, ताकि किसी भी आने वाले सिक्योरिटी प्रॉब्लम से बचा जा सके या उसे समय रहते रोका जा सके। इस प्रोजेक्ट को टेलीकॉम डिपार्टमेंट (DoT) की मंजूरी मिल चुकी है और इसे डिजिटल कम्युनिकेशन कमीशन (DCC) तथा एक इंटर-मिनिस्ट्रियल पैनल द्वारा आगे बढ़ाया जाएगा।

ऐसे में इस तरह के पोस्ट से भ्रमित होने के बजाय सरकार की तैयारियों और हमारी टेक्नोलॉजी पर भरोसा रखना ज्यादा सही फैसला है।

 
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