सावधान: धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है ई-कचरा

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सावधान: धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है ई-कचरा

 

जहां एक ओर सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हम दिन पर दिन आगे बढते जा रहें है वहीं दूसरी ओर जिगर, गुर्दे, हृदय, आंख, गले, त्वचा और मांसपेशियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले घातक ई-कचरे की देश में मात्रा भी बढ़ती जा रही है। आकड़ों के अनुसार इस साल ई कचरा आठ लाख मीट्रिक टन बढने की आशंका है।

2005 में देश में कुल 47 लाख मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ वहीं 2012 में इसके आठ लाख मीट्रिक टन बढने की आशंका है। हम आपको बता दें ई-कचरे के तहत इलेक्ट्रानिक एवं इलेक्ट्रिक साज सामान आते हैं जैसे टीवी, कंप्यूटर, लैपटाप, मोबाइल फोन, रेफ्रीजरेटर जैसी वस्तुएं।

ई-कचरे में फाइबरग्लास, पीवीसी, थर्मोसेटिंग प्लास्टिक, जस्ता, टिन, तांबा, सिलिकान, कार्बन, लौह, एल्यूमिनियम, कैडमियम, पारा, आर्सेनिक, कोबाल्ट, गैलियम, जर्मेनियम, ईडियम, लीथियम, मैंग्नींज, निकेल, फ्लूरोसेंट ट्यूब, स्विच, मैकेनिकल डोरबेल, फ्लैट स्क्रीन मानिटर आदि आते हैं।

इन ई-कचरे से हमारे स्वास्थ्य पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है क्‍योंकि इसका असर हमारी मांसपेशियों को कमजोर करता है साथ में त्वचा रोग, प्रजनन क्षमता में कमी, शरीर का कम विकास, जिगर और गुर्दे को नुकसान, हृदय रोग, थायरायड, आंख एवं गले के रोग के रूप में देखने को मिल सकता है।

 

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