सैटेलाइट इंटरनेट लॉन्च पर घमासान: TRAI और सरकार के बयान से बढ़ा भ्रम, Starlink जैसी कंपनियां इंतजार में
भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस की शुरुआत को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। शुक्रवार को भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने साफ़ किया कि उसके पास सैटेलाइट कम्युनिकेशन स्पेक्ट्रम से जुड़ी कोई लंबित सिफारिश या रेफरेंस नहीं है।
यह बयान तब आया जब ठीक एक दिन पहले केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा था कि TRAI को अभी भी सैटेलाइट सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम प्राइस पर अपनी सिफारिशें अंतिम रूप देनी हैं।

TRAI का पलटवार
TRAI के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि TRAI पहले ही सैटेलाइट कम्युनिकेशन के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन और प्राइस से जुड़ी सिफारिशें दे चुका है। इसके बाद डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशंस (DoT) की ओर से कोई नया रेफरेंस नहीं आया है।
इस बयान ने सीधे तौर पर मंत्री के दावे का खंडन कर दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि सैटेलाइट इंटरनेट लॉन्च में देरी की असली वजह शायद नीति-निर्णय के स्तर पर भ्रम है, न कि केवल TRAI की कोई तकनीकी देरी।
मई 2025 में दी गई थीं सिफारिशें
जानकारी के मुताबिक, TRAI ने मई 2025 में DoT को सैटेलाइट इंटरनेट के लिए विस्तृत सिफारिशें सौंपी थीं। इनमें कहा गया था कि सभी सैटेलाइट सेवा प्रदाताओं - जैसे एलन मस्क की Starlink, OneWeb और Amazon Kuiper जैसी कंपनियों पर वार्षिक राजस्व (Adjusted Gross Revenue या AGR) का 4 प्रतिशत स्पेक्ट्रम शुल्क लगाया जाए।
यह शुल्क GSO (Geostationary Satellite Orbit) और NGSO (Non-Geostationary Satellite Orbit) दोनों प्रकार के ऑपरेटर्स पर लागू होगा, और प्रति MHz न्यूनतम वार्षिक शुल्क ₹3,500 तय किया गया था।
इसके अलावा, शहरी क्षेत्रों में सेवा देने वाले ऑपरेटर्स से प्रति ग्राहक ₹500 वार्षिक शुल्क लिया जाएगा, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने वालों को इस शुल्क से छूट दी जाएगी।
TRAI ने यह भी सुझाव दिया था कि सैटेलाइट ब्रॉडबैंड स्पेक्ट्रम को पहले 5 वर्षों के लिए दिया जाए, जिसे बाद में 2 साल तक बढ़ाया जा सके।
सिंधिया का बयान
गुरुवार को इंडिया मोबाइल कांग्रेस (IMC 2025) में बोलते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा था कि भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड लॉन्च दो अहम कारकों पर निर्भर है । पहला सेवा प्रदाताओं की ओर से रोलआउट प्लान और दूसरा TRAI की ओर से स्पेक्ट्रम प्राइसिंग पर अंतिम सिफारिशें क्या है।
उन्होंने कहा कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि कंपनियां अपनी रणनीति कितनी जल्दी लागू करती हैं। एक मुद्दा यह है कि TRAI को अभी स्पेक्ट्रम प्राइसिंग को अंतिम रूप देना है, और वही लंबित है।
सिंधिया के इस बयान से ऐसा संकेत मिला कि सरकार अभी TRAI की सिफारिशों का इंतज़ार कर रही है। लेकिन TRAI के जवाब के बाद अब स्थिति उलझ गई है कि देरी किस स्तर पर हो रही है।
सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों के लिए असमंजस
इस विवाद का सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ रहा है जो भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू करने की तैयारी कर रही हैं। Starlink, Bharti-backed OneWeb और Amazon जैसी कंपनियां कई महीनों से लाइसेंसिंग और स्पेक्ट्रम पॉलिसी का इंतज़ार कर रही हैं।
TRAI और DoT के बीच समन्वय की कमी के चलते इन कंपनियों की लॉन्च टाइमलाइन लगातार पीछे खिसकती जा रही है। यह देरी भारत में ग्रामीण कनेक्टिविटी मिशन पर भी असर डाल सकती है, क्योंकि सैटेलाइट इंटरनेट का मुख्य उद्देश्य दूरदराज़ इलाकों में हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड पहुंचाना है।
क्या है आगे का रास्ता?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि TRAI और DoT के बीच यह अस्पष्टता बनी रही तो भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं का वाणिज्यिक लॉन्च 2026 तक टल सकता है। सरकार का लक्ष्य है कि देश के 6 लाख से अधिक गांवों तक डिजिटल कनेक्टिविटी पहुंचाई जाए, लेकिन इसके लिए स्पष्ट नीति और तेज़ निर्णय-प्रक्रिया की आवश्यकता है।
अब सबकी नजर इस पर टिकी है कि क्या DoT जल्द ही TRAI की सिफारिशों पर कार्रवाई करेगा, या फिर यह मुद्दा आने वाले महीनों में और राजनीतिक रंग ले लेगा।


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