2000 ऐप्स पर सुप्रीम कोर्ट की नजर; e-sports के नाम पर चल रहा ऑनलाइन बेटिंग घोटाला
भारत में जब ऑनलाइन बेटिंग और जुआ ऐप्स पर बैन लगाया गया था, तब ऐसा लगा था कि अब यह पूरा इंडस्ट्री खत्म हो जाएगा। लेकिन सच्चाई कुछ और ही निकली। अब वही ऐप्स 'ई-स्पोर्ट्स' (E-Sports) के नाम पर वापसी कर चुके हैं - और इस बार, मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है।
दरअसल, Centre for Accountability and Systematic Change (CASC) नामक संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की है, जिसमें कहा गया है कि करीब 2000 ऐप्स इस समय भारत में "ई-स्पोर्ट्स प्लेटफॉर्म" के नाम पर खुलेआम ऑनलाइन जुआ और सट्टेबाज़ी करा रहे हैं।

क्या है यह नया मामला?
PIL के मुताबिक, कई विदेशी और घरेलू कंपनियां ऑनलाइन गेमिंग एक्ट के loopholes का फायदा उठाकर अपने प्लेटफॉर्म को "ई-स्पोर्ट्स" या "स्किल-बेस्ड गेमिंग" बता रही हैं। पर असल में इन ऐप्स पर पैसों के लेनदेन के साथ बेटिंग, रमी, और सट्टा जैसी गतिविधियां चल रही हैं।
याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस पर जवाब मांगा है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि सरकार बताए कि इन गैम्बलिंग प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और आगे क्या एक्शन प्लान है।
PIL में क्या मांगा गया है?
CASC की याचिका में पांच प्रमुख मांगें रखी गई हैं कि Online Gaming Act, 2025 में संशोधन कर loopholes को हटाया जाए ताकि जुआ ऐप्स ई-स्पोर्ट्स के नाम पर न चल सकें।
केंद्र सरकार सभी गैरकानूनी बेटिंग और जुआ ऐप्स को तुरंत ब्लॉक करे। RBI और NPCI को निर्देश दिए जाएं कि वे ऐसे ऐप्स पर मनी ट्रांजैक्शन रोकें जो भारत के बाहर रजिस्टर्ड हैं।
Tamil Nadu Prohibition of Online Gaming Act, 2022 की सख्त धाराओं को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया जाए। नाबालिगों (children) के डेटा की सुरक्षा की जाए, जो पहले से इन ऐप्स द्वारा इकट्ठा किया जा चुका है।
ई-स्पोर्ट्स के नाम पर 'बेटिंग' का नया जाल
यह पूरा मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि आजकल कई ऐप्स खुद को E-Sports Platform बताकर यूज़र्स को आकर्षित कर रहे हैं। वे दावा करते हैं कि उनके गेम्स "स्किल-बेस्ड" हैं, जबकि रियलिटी में वहां मनी बेटिंग सिस्टम चलता है।
ऐसे प्लेटफॉर्म्स पर यूज़र्स को 'एंट्री फीस' के नाम पर पैसे लगाने होते हैं और विजेता को रिवॉर्ड के रूप में कैश मिलता है - जो पारंपरिक जुए से अलग नहीं है।
कानून के बावजूद जुआ क्यों नहीं रुका?
2025 में लागू हुए Promotion and Regulation of Online Gaming Act का उद्देश्य था कि स्किल-बेस्ड और चांस-बेस्ड गेम्स में फर्क किया जाए। लेकिन कंपनियां उसी ग्रे-एरिया का फायदा उठा रही हैं।
यह भी सच है कि भारत में ऑनलाइन जुआ सिर्फ कानून का नहीं, मानसिकता का भी मसला है। कई यूज़र्स अब इसे निवेश या मनोरंजन के रूप में देखते हैं, जिससे लत लगना आसान हो जाता है।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
कानूनी जानकारों का कहना है कि सरकार को सिर्फ बैन लगाने से आगे बढ़कर ट्रांजैक्शन और प्रमोशन चैनल्स पर भी नियंत्रण करना होगा।
डिजिटल विज्ञापनों के ज़रिए इन ऐप्स का प्रचार हो रहा है, जो युवाओं को तेजी से लुभा रहा है।
साथ ही, इन कंपनियों में से कई विदेशों में रजिस्टर्ड हैं, जिससे उन पर कार्रवाई करना और मुश्किल हो जाता है।
ई-स्पोर्ट्स बनाम ई-स्पोर्ट्स बेटिंग
भारत में असली ई-स्पोर्ट्स (जैसे BGMI, Valorant, Free Fire tournaments) को भी इस अवैध जाल का नुकसान झेलना पड़ रहा है।
क्योंकि जब सरकार "ई-स्पोर्ट्स" शब्द सुनती है, तो वह सीधे जुए से जोड़ देती है - जिससे असली गेमिंग कंपनियों को भी रेग्युलेशन और ब्रांड वैल्यू का खतरा बढ़ रहा है।
बैन नहीं, ट्रांसपेरेंसी की तैयारी
अब यह साफ है कि सिर्फ "बैन" से यह समस्या खत्म नहीं होने वाली। ज़रूरत है एक ऐसे रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क की जो असली ई-स्पोर्ट्स को बढ़ावा दे और अवैध जुआ ऐप्स को कठोर सजा दे।
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई के बाद उम्मीद है कि सरकार इस "डिजिटल बेटिंग माफिया" पर अब निर्णायक एक्शन लेगी।


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